हर बात किस ग्रंथ से आई है
सात चक्रों पर हमारे पन्नों में जो कुछ भी लिखा है — कौन-से ग्रंथ में, कौन-से अध्याय में, कौन-से श्लोक में — सब यहाँ खुला रखा है। मूल संस्कृत, उसका सीधा हिंदी अर्थ, और पूरा हवाला। ताकि कोई यह न पूछ सके कि «यह मनगढ़ंत तो नहीं है»।
Every claim our pages make about the seven chakras, traced to the exact verse it comes from — original Sanskrit, plain meaning, and the full citation. Fourteen public-domain scriptures. Nothing invented.
जो नीचे लिखा है, वह हज़ारों साल से लिखा हुआ है
हर शक्ति, हर सिद्धि, हर चक्र का जागरण — उसी ग्रंथ के उसी श्लोक के साथ, संस्कृत मूल सहित। हमने कुछ गढ़ा नहीं। हमने वह खोलकर रख दिया जो सदियों तक गुरु से शिष्य तक, हाथ से हाथ, सँभालकर लाया गया।
यह कल्पना नहीं है। पतंजलि ने इन सिद्धियों को एक-एक करके गिनाया है। शिव संहिता ने उनका मार्ग बताया है। और उपनिषद उस नाद का पूरा गणित देते हैं जो आपकी साँस अभी, इसी क्षण कर रही है — दिन में इक्कीस हज़ार छह सौ बार, बिना आपको बताए।
और परंपरा ईमानदार है — वह इन शक्तियों का वर्णन भी करती है, और चेतावनी भी देती है। पतंजलि इन्हीं सिद्धियों को गिनाने के बीच रुककर कहते हैं कि ये समाधि के रास्ते के पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं (योगसूत्र 3.37)। वह पूरी चेतावनी-सूची भी नीचे रखी है — छिपाई नहीं गई।
Every claim below is traced to its exact verse — Sanskrit original quoted, source and era named. Fourteen public-domain texts. Nothing invented, nothing hidden.
सात चक्र — सातों द्वार बंद हैं, छूने पर खुलते हैं
हर द्वार के भीतर: संस्कृत नाम · मूल श्लोक देवनागरी में · सीधा हिंदी अर्थ · पूरा हवाला (ग्रंथ · अध्याय · श्लोक) · और फिर — परंपरा के अनुसार उस चक्र के जागरण पर क्या कहा गया है।
Seven closed doors. Tap one to open it.
1मूलाधारMūlādhāra · Root Centre
ध्यात्वैतन्मूलचक्रान्तरविवरलसत्कोटिसूर्यप्रकाशां
वाचामीशो नरेन्द्रः स भवति सहसा सर्वविद्याविनोदी ।
आरोग्यं तस्य नित्यं निरवधि च महानन्दैकतान्तरात्मा…
अर्थ — जो इस मूल-चक्र के भीतर करोड़ सूर्यों-सी दमकती उस शक्ति का ध्यान करता है, वह अचानक वाणी का स्वामी हो जाता है, मनुष्यों में राजा बन जाता है, और समस्त विद्याओं में रमने वाला हो जाता है। उसका आरोग्य नित्य रहता है और उसका अंतरात्मा अपार आनंद से भर जाता है।
He who meditates on this root centre becomes at once a master of speech, a king among men, and one who delights in all knowledge.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारकरोड़ सूर्यों-सी दमकती उस शक्ति का ध्यान करने वाला अचानक वाणी का स्वामी बन जाता है, और मनुष्यों में राजाषट्चक्रनिरूपण 13 — वाचामीशो नरेन्द्रः
- ग्रंथ के अनुसारसमस्त विद्याओं में रमने वाला हो जाता है — जो कभी पढ़ा नहीं, वह भी खुलने लगता हैषट्चक्रनिरूपण 13 — सर्वविद्याविनोदी
- ग्रंथ के अनुसारउसका आरोग्य नित्य रहता है और अंतरात्मा अपार आनंद से भर जाता हैषट्चक्रनिरूपण 13 — आरोग्यं तस्य नित्यं
- ग्रंथ के अनुसारअभ्यास बढ़ने पर वह भूमि ही छोड़ देता है — पहले «दर्दुरी-सिद्धि», फिर भूमि-त्यागशिवसंहिता 5.64
- ग्रंथ के अनुसारभूत, वर्तमान और भविष्य — तीनों काल अपने कारणों समेत दिखने लगते हैंशिवसंहिता 5.66
- ग्रंथ के अनुसारकेवल जप-मात्र से मंत्र सिद्ध होने लगते हैं; वाणी पर विद्या की देवी बैठ जाती हैशिवसंहिता 5.67
- ग्रंथ के अनुसारछह महीने के नियमित अभ्यास में सिद्धि, और प्राण का सुषुम्ना में प्रवेशशिवसंहिता 5.73-5.74
जड़ मज़बूत हो तो डर कम होता है — पैसा, छत और सुरक्षा वाली भीतरी घबराहट पर पकड़ आती है, और आदमी ज़मीन पर पैर जमाकर खड़ा होना सीखता है।
2स्वाधिष्ठानSvādhiṣṭhāna · Sacral Centre
स्वाधिष्ठानाख्यमेतत्सरसिजममलं चिन्तयेद्यो मनुष्य-
स्तस्य अहंकार-दोषादिक-सकल-रिपुः क्षीयते तत्क्षणेन ।
योगीशः सोऽपि मोहाद्भुत-तिमिर-चये भानु-तुल्य-प्रकाशो
गद्यैः पद्यैः प्रबन्धैर्विरचयति सुधा-वाक्य-सन्दोह-लक्ष्मीः ॥
अर्थ — जो इस निर्मल स्वाधिष्ठान-कमल का ध्यान करता है, उसके अहंकार आदि सारे भीतरी शत्रु उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। वह योगियों का स्वामी बन जाता है और मोह के घने अँधेरे में सूर्य के समान चमकता है। उसकी वाणी से अमृत जैसे शब्द गद्य, पद्य और रचनाओं के रूप में बहने लगते हैं।
For him who contemplates this spotless lotus, every inner enemy — pride first among them — is destroyed that very instant; he shines like the sun in the thick darkness of delusion.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारअहंकार आदि सारे भीतरी शत्रु उसी क्षण नष्ट हो जाते हैंषट्चक्रनिरूपण 18 — सकल-रिपुः क्षीयते तत्क्षणेन
- ग्रंथ के अनुसारवह योगियों का स्वामी बन जाता है और मोह के घने अँधेरे में सूर्य के समान चमकता हैषट्चक्रनिरूपण 18 — भानु-तुल्य-प्रकाशो
- ग्रंथ के अनुसारउसकी वाणी से अमृत जैसे शब्द गद्य और पद्य बनकर बहने लगते हैंषट्चक्रनिरूपण 18 — सुधा-वाक्य-सन्दोह-लक्ष्मीः
- ग्रंथ के अनुसारजो शास्त्र उसने पढ़े ही नहीं, उन्हें निर्भय होकर बोलने लगता हैशिवसंहिता 5.77
- ग्रंथ के अनुसार«मृत्यु को वह खाता है, मृत्यु उसे नहीं» — और अणिमा-लघिमा आदि उच्चतम सिद्धियाँ मिलती हैंशिवसंहिता 5.78
यहाँ आदमी की रचनात्मकता और भावनाएँ बसती हैं — भीतर का सूखापन जाता है, काम में रस लौटता है, और शब्द अपने आप बहने लगते हैं।
3मणिपुरMaṇipūra · Navel Centre
अत्रास्ते लाकिनी सा सकलशुभकरी वेदबाहूज्ज्वलाङ्गी…
ध्यात्वैतन्नाभिपद्मं प्रभवति नितरां संहृतौ पालने वा
वाणी तस्याननाब्जे निवसति सततं ज्ञानसंदोहलक्ष्मीः ॥
अर्थ — इस नाभि-कमल का ध्यान करने वाला संहार और पालन — दोनों में पूर्ण समर्थ हो जाता है, और सरस्वती सदा उसके मुख-कमल पर निवास करती हैं, ज्ञान की समस्त सम्पदा के साथ।
He who meditates on this navel lotus becomes fully able both to destroy and to sustain; the goddess of speech dwells for ever upon his face.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारइस नाभि-कमल का ध्यान करने वाला संहार और पालन — दोनों में पूर्ण समर्थ हो जाता हैषट्चक्रनिरूपण 21 — प्रभवति नितरां संहृतौ पालने वा
- ग्रंथ के अनुसारसरस्वती सदा उसके मुख पर निवास करती हैं, ज्ञान की समस्त सम्पदा के साथषट्चक्रनिरूपण 21 — ज्ञानसंदोहलक्ष्मीः
- ग्रंथ के अनुसारवह पाताल-सिद्धि पाता है, इच्छाओं का स्वामी बनता है, मृत्यु को छल देता है, और दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकता हैशिवसंहिता 5.81
- ग्रंथ के अनुसारवह सोना बना सकता है, दिव्य-दृष्टि से सिद्धों को देख सकता है, रोगों की औषधि खोज लेता है, और गड़ा हुआ ख़ज़ाना देख लेता हैशिवसंहिता 5.82
- ग्रंथ के अनुसारनाभि-चक्र पर संयम से पूरे शरीर की रचना का ज्ञान हो जाता हैपतंजलि योगसूत्र 3.29 — नाभि-चक्रे काय-व्यूह-ज्ञानम्
यह इच्छाशक्ति और निर्णय का केंद्र है — यहाँ बल आने पर आदमी टालना छोड़ देता है, «ना» कहना सीख जाता है, और जो ठान लेता है उसे पूरा करता है।
4अनाहतAnāhata · Heart Centre
ध्यायेद्यो हृदि पङ्कजं सुरतरुं शर्वस्य पीठालयं
देवस्य अनिल-हीन-दीप-कलिका-हंसेन संशोभितं…
वाचामीश्वर ईश्वरोऽपि जगतां रक्षा-विनाशे क्षमः ॥
अर्थ — जो हृदय के उस कल्पवृक्ष-कमल का ध्यान करता है — जिसमें बिना हवा के जलती दीपशिखा जैसा हंस शोभित है — वह वाणी का ईश्वर हो जाता है और ईश्वर की तरह जगत की रक्षा और संहार में समर्थ हो जाता है।
He who meditates on the heart-lotus — the wish-granting tree, lit within by a flame that never flickers — becomes lord of speech, and able like God to protect and to dissolve the world.
योगीशो भवति प्रियात्प्रियतमः कान्ताकुलस्यानिशं
ज्ञानीशोऽपि कृती जितेन्द्रियगणो ध्यानावधानक्षमः ।
गद्यैः पद्यपदादिभिश्च सततं काव्याम्बुधारावहो
लक्ष्मीरङ्गणदैवतः परपुरे शक्तः प्रवेष्टुं क्षणात् ॥
अर्थ — वह योगियों का स्वामी बनता है, सबका प्रिय होता है, इन्द्रियों को पूरी तरह जीत लेता है, ध्यान में गहरा उतर सकता है, उसकी वाणी से काव्य की धारा बहती है, और वह क्षण-भर में दूसरे के शरीर में प्रवेश करने में समर्थ होता है।
He becomes lord among yogis, master of his senses, a river of poetry — and able to enter another's body in an instant.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारग्रंथ इसे कल्पवृक्ष कहता है — «माँगे से भी अधिक देने वाला»; भीतर बिना हवा के जलती दीपशिखा जैसी अचल ज्योति है, वही हंस हैषट्चक्रनिरूपण 22 और 26
- ग्रंथ के अनुसारध्यान करने वाला वाणी का ईश्वर हो जाता है, और ईश्वर की तरह जगत की रक्षा और संहार में समर्थषट्चक्रनिरूपण 26 — रक्षा-विनाशे क्षमः
- ग्रंथ के अनुसारवह इन्द्रियों को पूरी तरह जीत लेता है और उसकी वाणी से काव्य की धारा बहती हैषट्चक्रनिरूपण 27 — जितेन्द्रियगणो
- ग्रंथ के अनुसारवह क्षण-भर में दूसरे के शरीर में प्रवेश करने में समर्थ होता हैषट्चक्रनिरूपण 27 — परपुरे शक्तः प्रवेष्टुं क्षणात्
- ग्रंथ के अनुसारदृश्य और अदृश्य — दोनों जगत की वस्तुएँ उसे मिलती हैंशिवसंहिता 5.84
- ग्रंथ के अनुसारअपार ज्ञान, तीनों कालों का बोध, दिव्य श्रवण, दिव्य दृष्टि, और इच्छानुसार आकाश-गमनशिवसंहिता 5.86
- ग्रंथ के अनुसारखेचरी (आकाश में चलना) और भूचरी (इच्छानुसार सारे संसार में पहुँचना) — दोनों निश्चित मिलती हैंशिवसंहिता 5.87-5.88
- ग्रंथ के अनुसारहृदय पर संयम से चित्त का पूरा बोधपतंजलि योगसूत्र 3.34 — हृदये चित्त-संवित्
यह प्रेम और क्षमा का केंद्र है — यहाँ खुलने पर पुरानी कड़वाहट गिरती है, रिश्ते सुधरते हैं, और आदमी दूसरों को उनके होने भर से स्वीकार कर पाता है।
5विशुद्धViśuddha · Throat Centre
इह स्थाने चित्तं निरवधि विनिधाय आत्मसम्पूर्णयोगः
कविर्वाग्मी ज्ञानी स भवति नितरां साधकः शान्तचेताः ।
त्रिकालानां दर्शी सकलहितकरो रोगशोकप्रमुक्तः
चिरंजीवी निरवधि-विपदां ध्वंस-हंस-प्रकाशः ॥
अर्थ — जो इस स्थान पर अपने चित्त को निरंतर टिका देता है और आत्मा से पूर्ण योग पा लेता है — वह कवि हो जाता है, वाणी में समर्थ हो जाता है, ज्ञानी हो जाता है, और उसका चित्त परम शांत हो जाता है। वह तीनों कालों को देखने वाला होता है, सबका हित करने वाला, रोग और शोक से मुक्त, दीर्घजीवी, और अनंत विपत्तियों का नाश करने वाला हंस जैसा प्रकाशमान।
He who fixes his mind here becomes poet, orator and knower, his heart utterly still — a seer of the three times, free of sickness and sorrow, long-lived, shining like the swan that destroys endless calamity.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारवह कवि हो जाता है, वाणी में समर्थ, ज्ञानी — और उसका चित्त परम शांत हो जाता हैषट्चक्रनिरूपण 31 — कविर्वाग्मी ज्ञानी … शान्तचेताः
- ग्रंथ के अनुसारवह «त्रिकालानां दर्शी» कहलाता है — तीनों कालों को देखने वालाषट्चक्रनिरूपण 31 — त्रिकालानां दर्शी
- ग्रंथ के अनुसारवह रोग और शोक से मुक्त, दीर्घजीवी, और अनंत विपत्तियों का नाश करने वाला हंस जैसा प्रकाशमान होता हैषट्चक्रनिरूपण 31 — रोगशोकप्रमुक्तः · चिरंजीवी
- ग्रंथ के अनुसारचारों वेद अपने रहस्यों समेत तत्क्षण खुल जाते हैंशिवसंहिता 5.91
- ग्रंथ के अनुसारयहाँ मन टिकाकर यदि वह क्रोध करे तो तीनों लोक काँप उठते हैंशिवसंहिता 5.92
- ग्रंथ के अनुसारदेह कभी क्षीण नहीं होती — हज़ार वर्ष तक पूरा बल, और शरीर वज्र से भी कठोरशिवसंहिता 5.94
- ग्रंथ के अनुसारध्यान से उठने पर हज़ारों वर्ष उसे क्षण-भर जैसे लगते हैंशिवसंहिता 5.95
- ग्रंथ के अनुसारकंठ-कूप पर संयम से भूख और प्यास शांत हो जाती हैपतंजलि योगसूत्र 3.30 — कण्ठ-कूपे क्षुत्-पिपासा-निवृत्तिः
यह सच बोलने का केंद्र है — यहाँ खुलने पर आदमी जो भीतर है वही बाहर कह पाता है, और उसकी बात में वज़न आ जाता है।
6आज्ञाĀjñā · Brow Centre
ध्यानात्मा साधकेन्द्रो भवति परपुरे शीघ्रगामी मुनीन्द्रः
सर्वज्ञः सर्वदर्शी सकलहितकरः सर्वशास्त्रार्थवेत्ता ।
अद्वैताचारवादी विलसति परमापूर्वसिद्धिप्रसिद्धो
दीर्घायुः सोऽपि कर्ता त्रिभुवनभवने संहृतौ पालने च ॥
अर्थ — ध्यान में लीन वह साधकों का शिरोमणि हो जाता है, दूसरे के शरीर में तुरंत चला जाने वाला, मुनियों में श्रेष्ठ, सर्वज्ञ (सब जानने वाला), सर्वदर्शी (सब देखने वाला), सबका हित करने वाला, सब शास्त्रों का अर्थ जानने वाला। वह अपूर्व परम सिद्धियों से प्रसिद्ध होता है, दीर्घायु होता है, और तीनों लोकों की रचना, पालन और संहार का कर्ता बन जाता है।
Absorbed in meditation he becomes foremost of seekers — all-knowing, all-seeing, knower of the meaning of every scripture, long-lived, and maker, keeper and dissolver of the three worlds.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारवह «सर्वज्ञः सर्वदर्शी» हो जाता है — सब जानने वाला, सब देखने वालाषट्चक्रनिरूपण 34 — सर्वज्ञः सर्वदर्शी
- ग्रंथ के अनुसारवह सब शास्त्रों का अर्थ जान लेता है और अपूर्व परम सिद्धियों से प्रसिद्ध होता हैषट्चक्रनिरूपण 34 — सर्वशास्त्रार्थवेत्ता
- ग्रंथ के अनुसारवह तीनों लोकों की रचना, पालन और संहार का कर्ता बन जाता हैषट्चक्रनिरूपण 34 — कर्ता त्रिभुवनभवने
- ग्रंथ के अनुसारमृत्यु के समय जो अपना प्राण यहाँ स्थापित कर दे, वह वेदांत में वर्णित सनातन पुरुष में प्रवेश कर जाता हैषट्चक्रनिरूपण 38
- ग्रंथ के अनुसारपूर्वजन्मों के सारे कर्म बिना रुकावट नष्ट हो जाते हैंशिवसंहिता 5.111
- ग्रंथ के अनुसारबाक़ी पाँचों कमलों के जितने भी फल बताए गए, वे सब अकेले इसी आज्ञा-चक्र के ज्ञान से मिल जाते हैंशिवसंहिता 5.115
- ग्रंथ के अनुसारभ्रूमध्य के अमृत-चंद्र के ध्यान से भविष्य स्वयं खुल जाता है; खेचरी और भूचरी दोनों सिद्ध होती हैंशिवसंहिता 5.149-5.150
- ग्रंथ के अनुसारसिर की ज्योति पर संयम से सिद्धों के दर्शनपतंजलि योगसूत्र 3.32 — मूर्ध-ज्योतिषि सिद्ध-दर्शनम्
यहाँ वह समझ जागती है जो तर्क से पहले आ जाती है — आदमी लोगों को, हालात को और अपने अगले क़दम को साफ़ देखने लगता है।
7सहस्रारSahasrāra · Crown Centre
न भूयात् संसारे पुनरपि न बद्धस्त्रिभुवने
समग्रा शक्तिः स्यान्नियम-मनसस्तस्य कृतिनः
सदा कर्तुं हर्तुं खगतिरपि वाणी सुविमला ॥
अर्थ — वह फिर संसार में जन्म नहीं लेता, तीनों लोकों में कहीं बँधा नहीं रहता। उस संयमित-मन साधक को सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त होती है — सदा रचने और मिटाने की, आकाश में गति की, और अत्यंत निर्मल वाणी की।
He is not born into the world again, nor bound anywhere in the three worlds; to that disciplined mind comes entire power — to make, to unmake, to move through space, and a speech of utter clarity.
तस्या मध्यान्तराले शिवपदममलं शाश्वतं योगिगम्यं
नित्यानन्दाभिधानं सकलसुखमयं शुद्धबोधस्वरूपं ।
केचिद्ब्रह्माभिधानं पदमिति सुधियो वैष्णवं तल्लपन्ति
केचिद्धंसाख्यमेतत्किमपि सुकृतिनो मोक्षम् आत्म-प्रबोधं ॥
अर्थ — उसके मध्य में शिव का वह निर्मल, शाश्वत, योगियों को ही प्राप्य पद है — जिसका नाम नित्यानंद है, जो समस्त सुखमय है, और जो शुद्ध बोध का स्वरूप है। कुछ इसे ब्रह्म-पद कहते हैं, कुछ विद्वान इसे वैष्णव पद, कुछ हंस कहते हैं, और कुछ पुण्यवान इसे मोक्ष या आत्म-प्रबोध कहते हैं।
Within it is that spotless eternal seat of Shiva, called Everlasting Bliss, pure awareness itself — which some call Brahman, some the Vaishnava seat, some the Swan, and some simply liberation.
ग्रंथ के अनुसार, इसके जागरण पर क्या कहा गया है
- ग्रंथ के अनुसारवह फिर संसार में जन्म नहीं लेता और तीनों लोकों में कहीं बँधा नहीं रहताषट्चक्रनिरूपण 45 — न भूयात् संसारे पुनरपि
- ग्रंथ के अनुसारउसे «समग्रा शक्तिः» मिलती है — सदा रचने और मिटाने की पूरी शक्तिषट्चक्रनिरूपण 45 — समग्रा शक्तिः
- ग्रंथ के अनुसारआकाश में गति और अत्यंत निर्मल वाणी उसे सहज प्राप्त होती हैषट्चक्रनिरूपण 45 — खगतिरपि · वाणी सुविमला
- ग्रंथ के अनुसारवहाँ शिव का वह निर्मल शाश्वत पद है जिसका नाम नित्यानंद है — शुद्ध बोध का स्वरूप, जिसे कुछ लोग मोक्ष कहते हैंषट्चक्रनिरूपण 49
- ग्रंथ के अनुसारकेवल स्मरण-मात्र से ब्रह्म-ज्ञान; सब पाप नष्ट; फिर कभी मनुष्य-जन्म नहींशिवसंहिता 5.125
- ग्रंथ के अनुसारवह हज़ारों लोगों का उद्धार करता हैशिवसंहिता 5.143
- ग्रंथ के अनुसारपुनर्जन्म से मुक्ति; सृष्टि को रचने-मिटाने का सामर्थ्य; वहाँ से बहते अमृत को पीने से मृत्यु पर शासनशिवसंहिता 5.153-5.157
यहाँ पाने-खोने की गिनती छूट जाती है — जो है उसमें पूरा होना ही बचता है।
सातों जागने पर — अष्ट सिद्धि
यह आठवाँ द्वार है। इसमें वह है जो ग्रंथ तब कहते हैं जब सातों जाग जाएँ।
✦ अष्ट सिद्धिAṣṭa-siddhi · The eight powers
ततोऽणिमादि-प्रादुर्भावः कायसम्पत् तद्धर्मानभिघातश्च
अर्थ — भूतों पर विजय के बाद अणिमा आदि सिद्धियाँ प्रकट होती हैं, देह की सम्पत्ति (पूर्णता) आती है, और भूतों के धर्म उसे बाधा नहीं पहुँचाते।
Thereupon arise aṇimā and the rest, perfection of the body, and immunity from the obstruction of the elements.
⚠️ ईमानदारी की एक बात — इसे हम छिपा नहीं रहे
सूत्र में केवल «अणिमादि» (अणिमा आदि) लिखा है। आठों नाम सूत्र में नहीं हैं — वे व्यास-भाष्य में गिनाए गए हैं (लगभग ई. 400-500, वह भी public domain)। इसलिए हवाला «योगसूत्र 3.45 पर व्यास-भाष्य» है, अकेला «योगसूत्र 3.45» नहीं।
🛡️ और यह भी जान लीजिए: विभूतिपाद की क्रम-संख्या के दो प्रचलित संस्करण हैं, जिनमें ठीक 1 का अंतर है (3.45 बनाम 3.46)। इसीलिए हर हवाले के साथ संस्कृत का पहला पद भी दिया गया है — तब कोई भी संस्करण हो, श्लोक पकड़ में आ जाता है।
आठों सिद्धियाँ
| # | सिद्धि | IAST | ग्रंथ के अनुसार अर्थ | आज की भाषा में |
|---|---|---|---|---|
| 1 | अणिमा | Aṇimā | परमाणु जितना सूक्ष्म हो जाना | जहाँ जगह न हो, वहाँ भी जगह बना लेना |
| 2 | लघिमा | Laghimā | रुई जितना हल्का हो जाना | बोझ उतर जाना, भारहीन लगना |
| 3 | महिमा | Mahimā | असीम विशाल हो जाना | अपने से बड़ा होकर सोचना और जीना |
| 4 | प्राप्ति | Prāpti | जो चाहे, जहाँ है वहीं पहुँच जाए | दूरी का बाधा न रहना |
| 5 | प्राकाम्य | Prākāmya | जो इच्छा हो वह पूरी होना | संकल्प का फलित होना |
| 6 | वशित्व | Vaśitva | समस्त भूतों पर वश | अपने ऊपर और परिस्थिति पर नियंत्रण |
| 7 | ईशित्व | Īśitva | स्वामित्व और ऐश्वर्य | जहाँ खड़ा हो, वहाँ का स्वामी होना |
| 8 | यत्रकामावसायित्व | Yatrakāmāvasāyitva | संकल्प का कहीं भी न रुकना | इच्छा और यथार्थ के बीच दूरी मिट जाना |
और इसी के साथ
- ग्रंथ के अनुसाररूप · लावण्य · बल · वज्र जैसी दृढ़ता — «काय-सम्पत्»पतंजलि योगसूत्र 3.46
- ग्रंथ के अनुसारमन जैसी गति; देह के बिना इन्द्रिय-क्रिया; प्रकृति पर विजयपतंजलि योगसूत्र 3.48
- ग्रंथ के अनुसारसर्वज्ञता और सब भावों पर अधिष्ठातृत्वपतंजलि योगसूत्र 3.49
- ग्रंथ के अनुसारपुनर्जन्म से मुक्ति और «समग्रा शक्तिः» — रचने-मिटाने की पूरी शक्तिषट्चक्रनिरूपण 45
🔴 और उसी साँस में, ग्रंथ की अपनी चेतावनी
ये सिद्धियाँ समाधि के मार्ग में विघ्न हैं। इनसे भी वैराग्य हो, तभी कैवल्य मिलता है। देवताओं का निमंत्रण मिले तो भी न फूलो।
हवाला — पतंजलि योगसूत्र 3.37 · 3.50 · 3.51 · योगतत्त्व उपनिषद् 75-76
सोऽहम् का शास्त्रीय आधार
वह जप जो आपकी साँस पहले से कर रही है — और वह उपनिषद् जो उसका पूरा गणित देता है।
ॐ हंस उपनिषद् — अजपा, 21,600 और दस नादHaṃsa Upaniṣad · Śukla Yajurveda
⚠️ हवाला देने का सही तरीक़ा — यहाँ तीन अलग क्रमांकन चलते हैं
K. N. Aiyar (1914) का संस्करण बिना श्लोक-अंक का लगातार गद्य है; एक और संस्करण में केवल 4 श्लोक हैं और पूरा योग-भाग श्लोक 4 के अंदर है; संस्कृत मूल में 3 आरंभिक श्लोक + खण्ड ॥१॥ + खण्ड ॥२॥ हैं।
👉 इसलिए हवाला «हंस उपनिषद् — अजपा-प्रकरण (खण्ड 2)» जैसा दिया गया है। नंगा «हंस उपनिषद् 1.5» कभी नहीं — वैसा कोई अंक है ही नहीं। नंबर झूठ बोल सकता है, विषय नहीं।
उपनिषद् क्या कहता है
- ग्रंथ के अनुसारजीव «ह» के साथ बाहर जाता है और «स» के साथ भीतर आता है — इस तरह वह निरंतर «हंस-हंस» जपता रहता हैध्यानबिन्दु उपनिषद् 61(ख)-63
- ग्रंथ के अनुसारएक दिन-रात में 21,600 हंस — यानी 21,600 साँसें, और उतने ही सोऽहम्हंस उपनिषद् — अजपा-प्रकरण · ध्यानबिन्दु उपनिषद् 61(ख)-63
- ग्रंथ के अनुसारइसी को «अजपा गायत्री» कहा गया है — बिना जपा हुआ जप; ग्रंथ कहता है कि यही योगियों को निर्वाण देती हैध्यानबिन्दु उपनिषद् 61(ख)-63
- ग्रंथ के अनुसारन भूतकाल में, न भविष्य में — इसके बराबर कोई विद्या, कोई जप, कोई पुण्य-कर्म नहीं हैध्यानबिन्दु उपनिषद् 64-66(क)
- ग्रंथ के अनुसारमंत्र का ढाँचा — हंस ऋषि, अव्यक्ता गायत्री छंद, परमहंस देवता; «हं» बीज, «सः» शक्ति, «सोऽहम्» कीलकहंस उपनिषद् — अजपा-प्रकरण
- ग्रंथ के अनुसारसाधना का क्रम उपनिषद् ख़ुद देता है — मूलाधार से वायु उठाकर, स्वाधिष्ठान की तीन परिक्रमा, मणिपूरक, अनाहत को पार, विशुद्धि में प्राण, फिर आज्ञा, और अंत में ब्रह्मरन्ध्रहंस उपनिषद् — साधना-प्रकरण (खण्ड 1)
- ग्रंथ के अनुसारवह परमहंस करोड़ों सूर्यों की आभा वाला है, जिससे यह सारा जगत व्याप्त हैहंस उपनिषद् — साधना-प्रकरण
दस नाद — सीढ़ी-दर-सीढ़ी क्या कहा गया है
हवाला — हंस उपनिषद्, नाद-प्रकरण (खण्ड 2)
| # | ध्वनि | ग्रंथ के अनुसार उस सीढ़ी पर क्या होता है |
|---|---|---|
| 1 | चिनि | देह में झनझनाहट |
| 2 | चिनि-चिनि | देह में भंजन — टूटने जैसा अनुभव |
| 3 | घंटा | भेदन — कुछ छिदने जैसा |
| 4 | शंख | सिर हिलने लगता है |
| 5 | तन्त्री (वीणा) | तालु में अमृत-रस झरता है |
| 6 | ताल (मंजीरा) | अमृत की प्राप्ति |
| 7 | वेणु (बाँसुरी) | छिपी हुई वस्तुओं का ज्ञान |
| 8 | भेरी (नगाड़ा) | परावाक् सुनाई देती है — वह वाणी जो शब्द से पहले है |
| 9 | मृदंग | देह अदृश्य हो जाती है और शुद्ध दिव्य-चक्षु खुल जाता है |
| 10 | मेघ-गर्जन | आत्मा के साथ परब्रह्म की प्राप्ति |
⚠️ एक बारीक़ी
आठवें और नौवें नाद का क्रम संस्कृत मूल और अंग्रेज़ी अनुवाद में उलटा मिलता है — इसलिए क्रम-संख्या पर नहीं, नाम और अनुभव पर ज़ोर दीजिए।
The Haṃsa Upaniṣad gives the count of the breath itself — 21,600 in a day and night — and calls it the ajapā gāyatrī, the prayer no one has to say.
परंपरा की अपनी चेतावनियाँ
यह खंड हमने जोड़ा नहीं — यह ग्रंथों का अपना है। जो पन्ना सिर्फ़ चमत्कार गिनाता है वह ठग लगता है; ग्रंथ ख़ुद चमत्कार गिनाकर उसी साँस में चेताते हैं।
⚠ ग्यारह चेतावनियाँ, हर एक के हवाले के साथWhat the texts themselves warn about
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीसिद्धियाँ समाधि के रास्ते का विघ्न हैं — «ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः»पतंजलि योगसूत्र 3.37
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीइन सिद्धियों से भी वैराग्य हो, तभी कैवल्य — «तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्»पतंजलि योगसूत्र 3.50
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीदेवताओं का निमंत्रण मिले तो भी न फूलो, न लिप्त हो — «स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणम्»पतंजलि योगसूत्र 3.51
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीसिद्धियाँ योग की प्राप्ति में बड़ी बाधा हैं — इनमें रस मत लो। और यह ठीक उन्हीं श्लोकों के बाद आता है जो सबसे चमकदार सिद्धियाँ गिनाते हैं (73-74)योगतत्त्व उपनिषद् 75-76
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीयह विद्या गुप्त रखने योग्य है — अनाहत के इस ध्यान का महत्व ब्रह्मा तक गुप्त रखते हैंशिवसंहिता 5.89
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीयह अत्यंत गुह्य विद्या है; अधिकारी वही जो इच्छाओं पर नियंत्रण रखे, गुरु के प्रति समर्पित हो और निरंतर चिंतन करेहंस उपनिषद् — आरंभिक प्रकरण
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीगुरु के बिना «मेलन» नहीं मिलता — वह सौ जन्मों में भी दुर्लभ हैयोगकुण्डलिनी उपनिषद् II.5-9
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीदस विघ्नों की सूची — आलस्य से लेकर योग-सत्य की अप्राप्ति तकयोगकुण्डलिनी उपनिषद् I.59-61
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीछह महीने का नियमित अभ्यास — यानी यह «आज करो, कल पाओ» नहीं हैशिवसंहिता 5.73 · योगतत्त्व उपनिषद् 22 तो बारह वर्ष कहता है
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीआचरण की शुद्धता साथ चाहिए — फल पाने वाला «शुद्धशीलः» कहा गया हैषट्चक्रनिरूपण 13
- ग्रंथ की अपनी चेतावनीआहार और नींद का संयम — अति-भोजन/अति-उपवास, अति-नींद/अति-जागरण योग नहींभगवद्गीता 6.16-6.17
और एक बात — साधक की देखभाल
- सोगहम् की साधना किसी भी हालत में की जा सकती है — वह सिर्फ़ साँस को देखना है, रोकना नहीं।
- गर्भावस्था, हृदय-रोग, मिर्गी या किसी गंभीर मानसिक अवस्था में गहरे प्राणायाम से पहले अपने चिकित्सक से बात करें।
स्रोत-बही — चौदह ग्रंथ, सब public domain
हर ग्रंथ का रचयिता, काल, और वह क्यों public domain है। सबसे पुराना ई.पू. का, सबसे नया 1919 का — किसी जीवित लेखक का कॉपीराइट यहाँ नहीं है।
All fourteen sources are in the public domain. Sanskrit originals quoted; all translations our own.
14 पूरी स्रोत-बहीThe source ledger · author, era, licence
1. षट्चक्रनिरूपण
क्या है: «श्रीतत्त्वचिन्तामणि» का छठा अध्याय
PUBLIC DOMAIN449 वर्ष पुराना। मूल संस्कृत पर कोई कॉपीराइट नहीं। (Arthur Avalon का प्रसिद्ध अनुवाद «The Serpent Power», 1919, भी अब PD — पर हमने उसका वाक्य नहीं लिया, संस्कृत मूल से अपना अनुवाद किया।)
हमने इससे क्या लिया: हर चक्र का श्लोक-वार फल (श्लोक 4-49) — मुख्य आधार
2. शिवसंहिता
क्या है: हठयोग का ग्रंथ, अध्याय 5 चक्रों का
PUBLIC DOMAINमूल संस्कृत public domain; Srisa Chandra Vasu का 1914 का अनुवाद भी PD।
हमने इससे क्या लिया: अध्याय 5 के चक्र-फल; 3.67 का «जीवन्मुक्त»
3. पातञ्जल योगसूत्र
क्या है: तृतीय पाद «विभूतिपाद»
PUBLIC DOMAINदो हज़ार वर्ष से अधिक पुराना; किसी जीवित लेखक का अधिकार नहीं।
हमने इससे क्या लिया: सूत्र 3.16-3.51 की पूरी सिद्धि-सूची और तीनों चेतावनियाँ
4. व्यास-भाष्य (योगभाष्य)
क्या है: योगसूत्र पर सबसे प्राचीन भाष्य
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: अष्ट-सिद्धि के आठों नाम (3.45 पर)
5. हंस उपनिषद्
क्या है: शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध योग-उपनिषद्
PUBLIC DOMAINप्राचीन मूल PD; अंग्रेज़ी संस्करण K. Narayanasvami Aiyar, «Thirty Minor Upanishads», 1914 — वह भी PD।
हमने इससे क्या लिया: सातों चक्रों की चढ़ाई · 21,600 श्वास · दस नाद · गुरु-चेतावनी
6. योगकुण्डलिनी उपनिषद्
क्या है: कृष्ण यजुर्वेद
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: कुण्डलिनी-जागरण · तीन ग्रंथियाँ · खेचरी · गुरु की अनिवार्यता
7. ध्यानबिन्दु उपनिषद्
क्या है: कृष्ण यजुर्वेद
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: 21,600 और अजपा गायत्री का दूसरा स्वतंत्र प्रमाण · दस मुख्य नाड़ियाँ · कैवल्य
8. नादबिन्दु उपनिषद्
क्या है: ऋग्वेद
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: नाद की अवस्थाएँ · भ्रमर-दृष्टांत · उन्मनी
9. योगतत्त्व उपनिषद्
क्या है: कृष्ण यजुर्वेद
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: घट-अवस्था की सिद्धियाँ (73-74) और उसी साँस में उनकी चेतावनी (75-76) · पाँच धारणाएँ
10. हठयोगप्रदीपिका
क्या है: हठयोग का आधार-ग्रंथ
PUBLIC DOMAIN500 वर्ष से अधिक पुराना; public domain।
हमने इससे क्या लिया: कुण्डलिनी और नाद
11. घेरण्डसंहिता
क्या है: सप्तांग योग
PUBLIC DOMAINpublic domain।
हमने इससे क्या लिया: शक्ति-चालन
12. चरक संहिता
क्या है: आयुर्वेद का आधार-ग्रंथ
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: ओज · पाँच वायु · सत्त्वावजय (⚠️ यहाँ «चक्र» शब्द नहीं आता — इसे चक्र से जोड़ना हमारी व्याख्या होगी, ग्रंथ का वचन नहीं)
13. सुश्रुत संहिता
क्या है: शल्य-तंत्र
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: मर्म
14. श्रीमद्भगवद्गीता
क्या है: अध्याय 6 (ध्यान-योग) और 8 (मृत्यु-काल)
PUBLIC DOMAINप्राचीन; public domain।
हमने इससे क्या लिया: ध्यान-योग और भ्रूमध्य में प्राण
🔴 तीन बातें जो हमें [अपुष्ट] मिलीं — इसलिए हमने उन्हें कहीं नहीं लिखा
● «Lord of speech and King among men» वाला वाक्य कई जगह शिवसंहिता के नाम से चलता है — वह शिवसंहिता में नहीं है। वह षट्चक्रनिरूपण 13 का है — «वाचामीशो नरेन्द्रः»।
● «त्रिकाल-ज्ञान» शब्द शिवसंहिता में कहीं नहीं है — वहाँ भाव है (5.66, 5.86), शब्द नहीं। «त्रिकालानां दर्शी» शब्द षट्चक्रनिरूपण 31 का है — उसी का हवाला दिया गया है।
● «वाक्-सिद्धि» शब्द भी शिवसंहिता के चक्र-प्रकरण में नहीं है। निकटतम सच्चा प्रमाण शिवसंहिता 5.67 और 4.11 है।
यह सूची जान-बूझकर यहाँ रखी है। इंटरनेट पर ये तीनों वाक्य ग़लत ग्रंथ के नाम से घूमते हैं — हमने जाँचकर सही ग्रंथ लिखा है।
📝 अनुवाद के बारे में: इस पन्ने के सारे हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद हमारे अपने हैं। किसी अनुवादक का वाक्य ज्यों का त्यों नहीं लिया गया — वह कॉपीराइट होता। जो उद्धृत है, वह संस्कृत मूल है, और वह public domain है।
