तुम लोगों से नहीं थके…
…हर किसी के लिए कोई और बनते-बनते थक गए हो। घर में एक चेहरा, दफ़्तर में दूसरा, फ़ोन पर तीसरा। यह थकान नींद से नहीं उतरती — यह उतरती है मौन में, जहाँ कोई देखने वाला नहीं। आज सिर्फ़ 10 मिनट — बिना मुखौटे के, बस अपने साथ। — ओशो के भाव से